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Friday, June 3, 2016

गुर्दे की सूजनकारण और उपाय

कभी-कभी गुर्दे में खराबी के कारण गुर्दे (वृक्क) अपने सामान्य आकार से बड़े हो जाते हैंऔर उसमें दर्द होता है। इस तरह गुर्दे को फूल जाने को गुर्दे की सूजन कहते हैं। इसमें दर्दगुर्दे के स्थान से चलकर कमर तक फैल जाता है।
***
*लक्षण :
गुर्दे रोगग्रस्त होने से रोगी का पेशाब पीले रंग का होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी का शरीर भी पीला पड़ जाता है, पलकेसूज जाती हैं, पेशाब करते समय कष्ट होता है, पेशाब रुक-रुककर आता, कभी-कभी अधिक मात्रा में पेशाब आता, पेशाब के साथ खून आता हैऔरपेशाब के साथ धातु आता (मूत्रघात) है। इस रोग से पीड़ित रोगी में कभी-कभी बेहोशी के लक्षण भी दिखाई देते हैं।
*भोजन तथा परहेज :
गुर्दे की सूजन से पीड़ित रोगी को भोजन करने के बाद तुरन्त पेशाब करना चाहिए। इससे गुर्दे की बीमारी, कमरदर्द, जिगर के रोग, गठिया, पौरुष ग्रंथि की वृद्धि आदि अनेक बीमारियों से बचाव होता है।ज्यादा मात्रा में दूध, दही, पनीर व दूध से बनीकोई भी वस्तु न खाएं। इस रोग से पीड़ित रोगी को ज्यादा मांस, मछली, मुर्गा, ज्यादा पोटेशियम वाले पदार्थ, चॉकलेट, काफी, दूध, चूर्ण, बीयर, वाइन आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।इस रोग में सूखे फल, सब्जी, केक, पेस्ट्री, नमकीन, मक्खन आदि नहीं खाना चाहिए।
*विभिन्न औषधियों से उपचार
*1. फिटकरी : भुनी हुई फिटकरी 1 ग्राम दिन में कम से कम 3 बार लेने से गुर्दे की सूजन दूर होती है।
*2. दालचीनी :दालचीनी खाने से गुर्दे की बीमारी मिटती है।
*3. सत्यानाशी : सत्यानाशी का दूध सेवन करने से गुर्दे का दर्द, पेशाब की परेशानी आदि दूर होती है।
*4. तुलसी : छाया में सुखाया हुआ 20 ग्राम तुलसीका पत्ता, अजवायन 20 ग्राम और सेंधानमक 10 ग्राम को पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण प्रतिदिन सुबह-शाम 2-2 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ लें। इसके सेवन से गुर्दे की सूजन के कारण उत्पन्न दर्द व बैचनीदूर होती है।
*5. नारंगी : सुबह नाश्ते से पहले 1-2 नांरगी खाकर गर्म पानी पीना चाहिए या नारंगी का रस पीना चाहिए। इससे गुर्दे की सूजन व अन्य रोग ठीक होता है। नारंगी गुर्दो को साफ रखने में उपयोगी होता है। गुर्दे के रोग में सेब और अंगूर का उपयोग करना भी लाभकारी होता है। गुर्दो को स्वस्थ रखने के लिए सुबह खाली पेट फलों का रस उपयोग करें।
*6. गाजर : गुर्दे के रोग से पीड़ित रोगी को गाजर के बीज 2 चम्मच 1 गिलास पानी में उबालकर पीना चाहिए। इससे पेशाब की रुकावट दूर होती है और गुर्दे की सूजन दूर होती है।
*7. बथुआ : गुर्दे के रोग में बथुआ फायदेमन्द होता है। पेशाब कतरा-कतरा सा आता हो या पेशाब रुक-रुककर आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।
*8. अरबी : गुर्दे के रोग और गुर्दे की कमजोरी आदि को दूर करने के लिए अरबी खाना फायदेमन्द होता है।
*9. तरबूज : गुर्दे के सूजन में तरबूज खाना फायदेमन्द होता है।
*10. ककड़ी : गाजर और ककड़ी या गाजर और शलजम का रस पीने से गुर्दे की सूजन, दर्द व अन्य रोग ठीक होते हैं। यह मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी होता है।
*11. आलू : गुर्दे के रोगी को आलू खाना चाहिए। इसमें सोडियम की मात्रा बहुत पायी जाती है औरपोटेशियम की मात्रा कम होती है।
*12. चंदन : चंदन के तेल की 5 से 10 बूंद बताशे परडालकर दूध के साथ प्रतिदिन 3 बार खाने से गुर्दे की सूजन दूर होती है और दर्द शान्त होता है।
*13. सिनुआर : सिनुआर के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से गुर्दे की सूजन मिटती है। साथ ही सिनुआर, करन्ज, नीम और धतूरे के पत्तों को पीसकर हल्का गर्म करके गुर्दे के स्थान पर बांधने से लाभ मिलता है।
*14. हुरहुर : पीले फूलों वाली हुरहुर के पत्तों को पीसकर नाभि के बाएं व दाएं तरफ लेप करने से फायदा होता है।16. कलमीशोरा : कलमीशोरा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम की मात्रा में गोखरू के काढ़े के साथ मिलाकर सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है। यह गुर्दे की पथरी के साथ होने वाले दर्द को दूर करता है।
*15. आम : प्रतिदिन आम खाने से गुर्दे की कमजोरीदूर होती है।18. मकोय : मकोय का रस 10-15 मिलीलीटर की मात्रामें प्रतिदिन सेवन करने से पेशाब की रुकावट दूर होती है। इससे गुर्दे और मूत्राशय की सूजन व पीड़ा दूर होती है।
*16. जंगली प्याज : कन्द का चूर्ण, ककड़ी के बीज और त्रिफला का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर आधा चम्मच दिन में 2 बार सुबह-शाम प्रतिदिन खिलाने से गुर्दे के रोग में आराम मिलता है।
*17. मूली :गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बन्द हो गया हो तो मूली का रस 20-40 मिलीलीटर दिन में 2से 3 बार पीना चाहिए।पेशाब में धातु का आना (मूत्राघात) रोग में मूली खाना लाभकारी होता है।मूली के पत्तों का रस 10-20 मिलीलीटर और कलमीशोरा का रस 1-2 मिलीलीटर को मिलाकर रोगी को पिलाने से पेशाब साफ आता है और गुर्दे की सूजन दूर होती है।प्रतिदिन आधा गिलास मूली का रस पीने से पेशाबके समय होने वाली जलन और दर्द दूर होता है।
*18. अडूसा (वासा): अडूसे और नीम के पत्ते को गर्म करके नाभि के निचले भाग पर सिंकाई करें और अडूसे के पत्तों का 5 मिलीलीटर रस व शहद 5 ग्राम मिलाकर पीने से गुर्दे के भयंकर दर्द तुरन्त ठीक होता है।
*19. पान: पान का सेवन करने से गुर्दे की सूजन व अन्य रोग में लाभ मिलता है।
*20. पुनर्नवा : पुनर्नवा के 10 से 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा सेवन करने से गुर्दे के रोगों में बेहद लाभकारी होता है।
*21. नींबू :नींबू के पेड़ की जड़ का चूर्ण 1 ग्राम पानी के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से गुर्दे की बीमारी में लाभ मिलता है।लौकी के टुकड़े-टुकड़े करके गर्म करके दर्द वाले जगह पर रखने और इसके रस से मालिश करने से गुर्दे का दर्द जल्द ठीक होता है।
*22 लौकी : लौकी के रस से गुर्दे वाले स्थान पर मालिश करने और पीस करके लेप करने से गुर्दे का दर्द तुरन्त कम हो जाता है।
*23. अंगूर : अंगूर की बेल के 30 ग्राम पत्ते को पीसकर नमक मिले पानी में मिलाकर पीने से गुर्दे का दर्द ठीक होता है।
*24. अपामार्ग : अपामार्ग की 5-10 ग्राम ताजी जड़को पानी में घोलकर गुर्दे के दर्द से पीड़ित रोगी को पिलाने से दर्द में तुरन्त आराम मिलता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है।
*25. एरण्ड : एरण्ड की मींगी को पीसकर गर्म करकेगुर्दे वाले स्थान पर लेप करने से गुर्दे की सूजन व दर्द ठीक होता है।

Thursday, June 2, 2016

**आयुर्वेद से डैंड्रफ दूर करने के उपाय**

 डैंड्रफ की समस्या होने पर स्कॉल्प
की सफाई का ध्यान
रखना आवश्यक है। इसीलिए सप्ताह में दो-
तीन बार
अच्छा हर्बल शैंपू करना चाहिए और
बालों को अच्छी तरह से
मालिश करनी चाहिए।
शैम्पू की जगह ये करे:: आंवला, रीठा और
शिकाकाई
तीनो का एक एक चम्म्च एक मग गर्म
पानी में घोल ले और
एक घण्टे बाद इसे शैम्पू की जगह लगाए
• रोज रात को बालों की जड़ों में सरसों के तेल से मालिश
कीजिए। सुबह शिकाकाई पानी में उबाल कर
उस पानी से बाल
धो लें।
• ग्लीसरीन और गुलाब जल को रोज
बालों की जड़ों में लगाने से
ये समस्या दूर हो सकती है।
• डैंड्रफ से बचने के लिए जैतून के तेल में अदरक के रस
की कुछ बूंदे मिलाकर इसे बालों की जड़ों में
लगाकर एक घंटे के
लिए छोड़ दें और फिर शैंपू से धो दें।
• आँवला,शिकाकाई पावडर को दही में मिलाए। यह मिश्रण
बालों में लगाने से बालों की डीप
कंडीशनिंग होती है।
• बालों में तेल लगाने के बाद स्टीम्ड तौलिए का प्रयोग
करना भी अच्छा रहता है या फिर गर्म तेल से स्कॉल्प
की मसाज करने से सिर की त्वचा को पोषण
मिलता है।
• बालों को बार-बार कंघी मत कीजिए,
नहीं तो स्कॉल्प से
ज्यादा ऑयल निकलने से डेंड्रफ
की समस्या भी बढ़ जाती है।
• खाने-पीने का खासा ध्यान
रखना जरूरी होता है। ऐसे में खूब
पानी पीना चाहिए।
• दही को बालों में कम से कम आधे घंटे तक लगाने से
डैंड्रफ
को दूर किया जा सकता है।
• नीबू का रस और काली मिर्च पाउडर
मिलाकर
बालों की जड़ों में लगाना भी अच्छा रहता है।
• अधिक स्ट्रांग तेल बालों का झड़ना बढ़ा सकता है। ऐसे में
जड़ीबूटी युक्त नीम और काले
तिल का तेल मिलाकर अधिक
डैंड्रफ होने पर सप्ताह में कम से कम तीन बार
लगाएं।
• आयुर्वेदिक शैंपू डैंड्रफ दूर करने के लिए अच्छा विकल्प है।
• नारियल के तेल में कपूर मिलाकर लगाने से डैंड्रफ दूर
होता है।
• दही से सिर धोने पर भी डेंड्रफ से
छुटकारा पाया जा सकता है।
डेंड्रफ के कारण ::
• बालों की ठीक तरह से सफाई न करना,
बालों को सही पोषण
न मिलना या फिर बालों में तेल न लगाने से डेंड्रफ
हो सकती है।
• पेट साफ़ न होना या कब्ज भी डेंड्रफ़ का कारण
होता है
• अधिक तनाव या पसीने के कारण भी ये
समस्या पनप
सकती है।
• हालांकि डेंड्रफ का कोई पुख्ता कारण मौजूद नहीं है,
लेकिन
सीबम उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों के
ज्यादा सक्रिय होने
की वजह से डेंड्रफ होता है।
• कम पानी पीने या फिर भोजन में पोषक
तत्वों की कमी के
कारण भी डेंड्रफ हो सकता है।
• युवावस्था में अधिक मात्रा में हॉर्मोंन्स रिलीज होने से
भी डैंड्रफ हो सकती है।
++++++
“जन-जागरण लाना है तो पोस्ट को Share करना है।”

Wednesday, June 1, 2016

भोजन विधि::

बालों के लिए बनाइये बहुत ही प्रभावी आयुर्वेदिक
तेल :-
आज हम आपके पतले – कमजोर पड़ चुके बालों के लिए एक
विशेष आयुर्वेदिक तेल बनाने की विधि बताएँगे जो
बेजान बालों को घने – काले केशों की घटा में बदल
देगा। घर पर बने इस तेल से आपके बालो को कालापन,
मजबूती, खुश्की, रुसी , बाल झडना आदी से निजात
मिलेगी, थोड़ी सी मेहनत से ये आपको बालो की
होने वाली सभी बीमारियों से निजात दिला
देगा ।
सामग्री :-
====
लौह भस्म – 10 ग्राम
ब्राहमी – 10 ग्राम
लाल चन्दन – 10 ग्राम
आंवला चूर्ण – 25 ग्राम
भ्रंगराज चूर्ण – 25 ग्राम
काफ़ी चूर्ण – 25 ग्राम
मेंहदी के पत्ते – 20 ग्राम ,
जैतून का तैल- 50 ग्राम ,
अरण्डी का तैल – 50 ग्राम ,
नारियल का तैल – 500 ग्राम,
* अब आप तैलो को छॊड कर सभी चूर्ण का पेस्ट बना लें
रात में पेस्ट बना कर रख दें. सुबह लोहे की कडाही में
तीनों तेल डाल कर यह पेस्ट डाल दें अब आप इस में -250
ग्राम पानी डाल दें.अब धीमी आंच पर पकाएं कि
पानी जल जाये और सिर्फ़ तेल बचे उसके बाद भी लगभग
दस मिनट और पकाएं फ़िर ठण्डा होने पर सूती कपडॆ की
चार तह बना कर उस में से निचोड कर छान लें छने हुए तेल
को एक बार फ़िर दो तह के सूती कपडॆ से छानकर रख लें
सप्ताह में कम से कम दो बार इस तेल से रात को हाथों
की अंगुलियों से बालों की जडॊ में अच्छी तरह से
लगायें जिस से तेल त्वचा के अन्दर समा जाए सारी
रात तेल लगा रह ने दें सुबह साफ़ पानी से बालों को
धो लें बाजार के शैम्पू का प्रयोग न करें.

भोजन विधि:

अधिकांश लोग भोजन
की सही विधि नहीं जानते।
गलत विधि से गलत
मात्रा में अर्थात् आवश्यकता से अधिक या बहुत कम भोजन करने से
या अहितकर भोजन करने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है,
जिससे कब्ज
रहने लगता है। तब आँतों में रूका हुआ मल सड़कर दूषित रस बनाने
लगता है। यह दूषित रस ही सारे शरीर में
फैलकर विविध प्रकार के
रोग उत्पन्न करता है। उपनिषदों में
भी कहा गया हैः आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः। शुद्ध
आहार से मन शुद्ध
रहता है। साधारणतः सभी व्यक्तियों के लिए आहार के
कुछ
नियमों को जानना अत्यंत आवश्यक है। जैसे-
आलस तथा बेचैनी न रहें, मल, मूत्र तथा वायु का निकास
य़ोग्य ढंग
से होता रहे, शरीर में उत्साह उत्पन्न हो एवं
हलकापन महसूस हो,
भोजन के प्रति रूचि हो तब समझना चाहिए की भोजन
पच गया है।
बिना भूख के खाना रोगों को आमंत्रित करता है। कोई
कितना भी आग्रह करे या आतिथ्यवश खिलाना चाहे पर
आप सावधान
रहें।
सही भूख को पहचानने वाले मानव बहुत कम हैं।
इससे भूख न
लगी हो फिर भी भोजन करने से
रोगों की संख्या बढ़ती जाती है।
एक
बार किया हुआ भोजन जब तक पूरी तरह पच न जाय
एवं खुलकर भूख
न लगे तब तक दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए।
अतः एक बार आहार
ग्रहण करने के बाद दूसरी बार आहार ग्रहण करने
के बीच कम-से-
कम छः घंटों का अंतर अवश्य रखना चाहिए क्योंकि इस
छः घंटों की अवधि में आहार की पाचन-
क्रिया सम्पन्न होती है।
यदि दूसरा आहार इसी बीच ग्रहण करें
तो पूर्वकृत आहार
का कच्चा रस(आम) इसके साथ मिलकर दोष उत्पन्न कर देगा।
दोनों समय के भोजनों के बीच में बार-बार चाय
पीने, नाश्ता, तामस
पदार्थों का सेवन आदि करने से पाचनशक्ति कमजोर
हो जाती है,
ऐसा व्यवहार में मालूम पड़ता है।
रात्रि में आहार के पाचन के समय अधिक लगता है
इसीलिए रात्रि के
समय प्रथम पहर में ही भोजन कर लेना चाहिए।
शीत ऋतु में रातें
लम्बी होने के कारण सुबह जल्दी भोजन
कर लेना चाहिए और
गर्मियों में दिन लम्बे होने के कारण सायंकाल का भोजन
जल्दी कर
लेना उचित है।
अपनी प्रकृति के अनुसार उचित मात्रा में भोजन
करना चाहिए। आहार
की मात्रा व्यक्ति की पाचकाग्नि और
शारीरिक बल के अनुसार
निर्धारित होती है। स्वभाव से हलके पदार्थ जैसे
कि चचावल, मूँग,
दूध अधिक मात्रा में ग्रहण करने सम्भव हैं परन्तु उड़द,
चना तथा पिट्ठी से बने पदार्थ
स्वभावतः भारी होते हैं, जिन्हें कम
मात्रा में लेना ही उपयुक्त रहता है।
भोजन के पहले अदरक और सेंधा नमक का सेवन
सदा हितकारी होता है। यह
जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भोजन के
प्रति रूचि पैदा करता है तथा जीभ एवं कण्ठ
की शुद्धि भी करता है।
भोजन गरम और स्निग्ध होना चाहिए। गरम भोजन स्वादिष्ट
लगता है, पाचकाग्नि को तेज करता है और शीघ्र पच
जाता है।
ऐसा भोजन अतिरिक्त वायु और कफ को निकाल देता है।
ठंडा या सूखा भोजन देर से पचता है। अत्यंत गरम अन्न बल
का ह्रास करता है। स्निग्ध भोजन शरीर को मजबूत
बनाता है,
उसका बल बढ़ाता है और वर्ण में भी निखार लाता है।
चलते हुए, बोलते हुए अथवा हँसते हुए भोजन
नहीं करना चाहिए।
दूध के झाग बहुत लाभदायक होते हैं। इसलिए दूध खूब उलट-
पुलटकर,
बिलोकर, झाग पैदा करके ही पियें। झागों का स्वाद लेकर
चूसें। दूध में
जितने ज्यादा झाग होंगे, उतना ही वह लाभदायक होगा।
चाय या कॉफी प्रातः खाली पेट
कभी न पियें, दुश्मन को भी न
पिलायें।
एक सप्ताह से अधिक पुराने आटे का उपयोग स्वास्थ्य के लिए
लाभदायक नहीं है।
भोजन कम से कम 20-25 मिनट तक खूब चबा-चबाकर एवं उत्तर
या पूर्व की ओर मुख करके करें।
अच्छी तरह चबाये बिना जल्दी-
जल्दी भोजन करने वाले चिड़चिड़े व
क्रोधी स्वभाव के हो जाते हैं।
भोजन अत्यन्त धीमी गति से
भी नहीं करना चाहिए।
भोजन सात्त्विक हो और पकने के बाद 3-4 घंटे के अंदर
ही कर
लेना चाहिए।
स्वादिष्ट अन्न मन को प्रसन्न करता है, बल व उत्साह बढ़ाता है
तथा आयुष्य की वृद्धि करता है,
जबकि स्वादहीन अन्न इसके विपरीत
असर करता है।
सुबह-सुबह भरपेट भोजन न करके हलका-
फुलका नाश्ता ही करें।
भोजन करते समय भोजन पर माता, पिता, मित्र, वैद्य, रसोइये, हंस,
मोर, सारस या चकोर
पक्षी की दृष्टि पड़ना उत्तम माना जाता है।
किंतु भूखे, पापी,
पाखंडी या रोगी मनुष्य, मुर्गे और कुत्ते
की नज़र
पड़ना अच्छा नहीं माना जाता।
भोजन करते समय चित्त को एकाग्र रखकर सबसे पहले मधुर,
बीच में
खट्टे और नमकीन तथा अंत में तीखे, कड़वे
और कसैले पदार्थ खाने
चाहिए। अनार आदि फल तथा गन्ना भी पहले
लेना चाहिए। भोजन के
बाद आटे के भारी पदार्थ, नये चावल
या चिवड़ा नहीं खाना चाहिए।
पहले घी के साथ कठिन पदार्थ, फिर कोमल व्यंजन और
अंत में
प्रवाही पदार्थ खाने चाहिए।
माप से अधिक खाने से पेट फूलता है और पेट में से आवाज
आती है।
आलस आता है, शरीर भारी होता है। माप
से कम अन्न खाने से शरीर
दुबला होता है और शक्ति का क्षय होता है।
बिना समय के भोजन करने से शक्ति का क्षय होता है,
शरीर अशक्त
बनता है। सिरदर्द और अजीर्ण के भिन्न-भिन्न रोग
होते हैं। समय
बीत जाने पर भोजन करने से वायु से अग्नि कमजोर
हो जाती है।
जिससे खाया हुआ अन्न शायद ही पचता है और
दुबारा भोजन करने
की इच्छा नहीं होती।
जितनी भूख हो उससे आधा भाग अन्न से, पाव भाग जल
से
भरना चाहिए और पाव भाग वायु के आने जाने के लिए
खाली रखना चाहिए। भोजन से पूर्व
पानी पीने से पाचनशक्ति कमजोर
होती है, शरीर दुर्बल होता है। भोजन के
बाद तुरंत पानी पीने से
आलस्य बढ़ता है और भोजन नहीं पचता।
बीच में थोड़ा-
थोड़ा पानी पीना हितकर है। भोजन के बाद
छाछ पीना आरोग्यदायी है।
इससे मनुष्य कभी बलहीन और
रोगी नहीं होता।
प्यासे व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए।
प्यासा व्यक्ति अगर
भोजन करता है तो उसे आँतों के भिन्न-भिन्न रोग होते हैं। भूखे
व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए।
अन्नसेवन से ही भूख को शांत
करना चाहिए।
भोजन के बाद गीले हाथों से आँखों का स्पर्श
करना चाहिए। हथेली में
पानी भरकर बारी-बारी से
दोनों आँखों को उसमें डुबोने से
आँखों की शक्ति बढ़ती है।
भोजन के बाद पेशाब करने से आयुष्य
की वृद्धि होती है। खाया हुआ
पचाने के लिए भोजन के बाद पद्धतिपूर्वक वज्रासन
करना तथा 10-15 मिनट बायीं करवट लेटना चाहिए(सोयें
नहीं),
क्योंकि जीवों की नाभि के ऊपर
बायीं ओर अग्नितत्त्व रहता है।
भोजन के बाद बैठे रहने वाले के शरीर में आलस्य भर
जाता है।
बायीं करवट लेकर लेटने से शरीर पुष्ट
होता है। सौ कदम चलने वाले
की उम्र बढ़ती है तथा दौड़ने वाले
की मृत्यु उसके पीछे
ही दौड़ती है।
रात्रि को भोजन के तुरंत बाद शयन न करें, 2 घंटे के बाद
ही शयन
करें।
किसी भी प्रकार के रोग में मौन
रहना लाभदायक है। इससे स्वास्थ्य
के सुधार में मदद मिलती है। औषधि सेवन के साथ मौन
का अवलम्बन
हितकारी है।
कुछ उपयोगी बातें-
घी, दूध, मूँग, गेहूँ, लाल साठी चावल,
आँवले, हरड़े, शुद्ध शहद,
अनार, अंगूर, परवल – ये सभी के लिए हितकर हैं।
अजीर्ण एवं बुखार में उपवास हितकर है।
दही, पनीर, खटाई, अचार, कटहल, कुन्द,
मावे की मिठाइयाँ – से
सभी के लिए हानिकारक हैं।
अजीर्ण में भोजन एवं नये बुखार में दूध विषतुल्य है।
उत्तर भारत में
अदरक के साथ गुड़ खाना अच्छा है।
मालवा प्रदेश में सूरन(जमिकंद) को उबालकर काली मिर्च
के साथ
खाना लाभदायक है।
अत्यंत सूखे प्रदेश जैसे की कच्छ, सौराष्ट्र आदि में
भोजन के बाद
पतली छाछ पीना हितकर है।
मुंबई, गुजरात में अदरक, नींबू एवं सेंधा नमक का सेवन
हितकर है।
दक्षिण गुजरात वाले पुनर्नवा(विषखपरा)
की सब्जी का सेवन करें
अथवा उसका रस पियें तो अच्छा है।
दही की लस्सी पूर्णतया हानिकारक
है। दहीं एवं मावे की मिठाई खाने
की आदतवाले पुनर्नवा का सेवन करें एवं नमक
की जगह सेंधा नमक
का उपयोग करें तो लाभप्रद हैं।
शराब पीने की आदवाले अंगूर एवं अनार खायें
तो हितकर है।
आँव होने पर सोंठ का सेवन, लंघन (उपवास)
अथवा पतली खिचड़ी और
पतली छाछ का सेवन लाभप्रद है।
अत्यंत पतले दस्त में सोंठ एवं अनार का रस लाभदायक है।
आँख के रोगी के लिए घी, दूध, मूँग एवं अंगूर
का आहार लाभकारी है।
व्यायाम तथा अति परिश्रम करने वाले के लिए घी और
इलायची के
साथ केला खाना अच्छा है।
सूजन के रोगी के लिए नमक, खटाई, दही,
फल, गरिष्ठ आहार, मिठाई
अहितकर है।
यकृत (लीवर) के रोगी के लिए दूध अमृत के
समान है एवं नमक,
खटाई, दही एवं गरिष्ठ आहार विष के समान हैं।
वात के रोगी के लिए गरम जल, अदरक का रस, लहसुन
का सेवन
हितकर है। लेकिन आलू, मूँग के सिवाय की दालें एवं
वरिष्ठ आहार
विषवत् हैं।
कफ के रोगी के लिए सोंठ एवं गुड़ हितकर हैं परंतु
दही, फल, मिठाई
विषवत् हैं।
पित्त के रोगी के लिए दूध, घी,
मिश्री हितकर हैं परंतु मिर्च-
मसालेवाले तथा तले हुए पदार्थ एवं खटाई विषवत् हैं।
अन्न, जल और हवा से हमारा शरीर
जीवनशक्ति बनाता है। स्वादिष्ट
अन्न व स्वादिष्ट व्यंजनों की अपेक्षा साधारण भोजन
स्वास्थ्यप्रद
होता है। खूब चबा-चबाकर खाने से यह अधिक पुष्टि देता है,
व्यक्ति निरोगी व
दीर्घजीवी होता है। वैज्ञानिक
बताते हैं
कि प्राकृतिक पानी में हाइड्रोजन और
ऑक्सीजन के सिवाय
जीवनशक्ति भी है। एक प्रयोग के अनुसार
हाइड्रोजन व ऑक्सीजन
से कृत्रिम पानी बनाया गया जिसमें खास स्वाद न
था तथा मछली व
जलीय प्राणी उसमें जीवित न
रह सके।
बोतलों में रखे हुए
पानी की जीवनशक्ति क्षीण
हो जाती है। अगर उसे
उपयोग में लाना हो तो 8-10 बार एक बर्तन से दूसरे बर्तन में
उड़ेलना (फेटना) चाहिए। इससे उसमें स्वाद और
जीवनशक्ति दोनों आ
जाते हैं। बोतलों में या फ्रिज में रखा हुआ पानी स्वास्थ्य
का शत्रु है।
पानी जल्दी-
जल्दी नहीं पीना चाहिए।
चुसकी लेते हुए एक-एक घूँट
करके पीना चाहिए जिससे पोषक तत्त्व मिलें।
वायु में भी जीवनशक्ति है। रोज सुबह-शाम
खाली पेट, शुद्ध हवा में
खड़े होकर या बैठकर लम्बे श्वास लेने चाहिए। श्वास
को करीब
आधा मिनट रोकें, फिर धीरे-धीरे छोड़ें। कुछ देर
बाहर रोकें, फिर लें।
इस प्रकार तीन प्राणायाम से शुरुआत करके
धीरे-धीरे पंद्रह तक
पहुँचे। इससे जीवनशक्ति बढ़ेगी,
स्वास्थ्य-लाभ होगा,
प्रसन्नता बढ़ेगी।
पूज्य बापू जी सार बात बताते हैं, विस्तार
नहीं करते। 93 वर्ष तक
स्वस्थ जीवन जीने वाले स्वयं उनके गुरुदेव
तथा ऋषि-मुनियों के
अनुभवसिद्ध ये प्रयोग अवश्य करने चाहिए।
स्वास्थ्य और शुद्धिः
उदय, अस्त, ग्रहण और मध्याह्न के समय सूर्य
की ओर कभी न
देखें, जल में भी उसकी परछाई न देखें।
दृष्टि की शुद्धि के लिए सूर्य का दर्शन करें।
उदय और अस्त होते चन्द्र की ओर न देखें।
संध्या के समय जप, ध्यान, प्राणायाम के सिवाय कुछ भी न
करें।
साधारण शुद्धि के लिए जल से तीन आचमन करें।
अपवित्र अवस्था में और जूठे मुँह स्वाध्याय, जप न करें।
सूर्य, चन्द्र की ओर मुख करके कुल्ला, पेशाब आदि न
करें।
मनुष्य जब तक मल-मूत्र के वेगों को रोक कर रखता है तब तक
अशुद्ध रहता है।
सिर पर तेल लगाने के बाद हाथ धो लें।
रजस्वला स्त्री के सामने न देखें।
ध्यानयोगी ठंडे जल से स्नान न करे।