आमतौर पर मासिकधर्म आने का समय 28 दिन का होता है। परन्तु यह कभी-कभी 20 दिनों में ही हो जाता है और कभी-कभी 45 दिनों पर भी होता है। कभी-कभी मासिकधर्म की अनियमितता होने से प्रजनन क्षमता अर्थात गर्भधारण करने की क्षमता कम हो जाती है। इस मासिकधर्म के 2 महत्वपूर्ण परिणाम होते हैं-
हर महीने डिंबाशयों से सामान्यत: एक परिपक्व डिंब निकलता है जिससे एक वक्त में एक ही भ्रूण का विकास होता है।
महीने के वांच्छित समय पर निषेचित डिंब की स्थापना के लिए अंतगर्भाशय कला को तैयार करना।
महीने के वांच्छित समय पर निषेचित डिंब की स्थापना के लिए अंतगर्भाशय कला को तैयार करना।
मासिकस्राव से गर्भाशय के स्वास्थ्य का पता चलता है तथा इससे ही डिंबाशयों व पिट्युटरी ग्रंथि को नियंत्रण करने वाली इण्डोक्राइन ग्रंथियों के स्वास्थ्य का भी पता चलता है। स्त्री की प्रजनन प्रणाली की विसंगतियां अधिक मासिकस्राव की विसंगतियों में भी शामिल रहती है। ऐसी ही कुछ विसंगतियां हैं।
मासिकस्राव का बन्द होना-
यदि कोई स्त्री कभी रजस्वलित (मासिकधर्म न आया हो) नहीं हुई हो तो ऐसी स्थिति को प्राथमिक अनार्तव कहते हैं। यह इंडोक्राइन की विसंगतियां अधिकतर पिट्युटरी ग्रंथि या अध-श्चेतक (हाईपोथैलेमस) की विसंगतियों या अनुवांशिक कारणों से डिबांशयों या गर्भाशय के असामान्य विकास के कारण होती है।
दूसरे प्रकार के अनार्तव (मासिकधर्म न आना) में किसी भी स्त्री के जीवन में कभी-कभी एक या दो मासिकधर्म सामान्य नहीं होते हैं। स्त्रियों में मासिकधर्म की ऐसी गड़बड़ी शारीरिक वजन के कम या अधिक होने के कारण मानी जाती है। मोटापा डिंबाशयों की प्रणाली को अव्यवस्थित कर सकता है और इस प्रकार भूख न लगने पर शारीरिक वजन में अधिक कमी के कारण मासिकस्राव रुक जाता है। परन्तु जब मासिकधर्म का संबंध शारीरिक वजन से नहीं होता, तब पिट्युटरी और डिंबाशयों के हार्मोन्स की कमी होना इसका कारण होता है।
No comments:
Post a Comment